केंद्र की मोदी सरकार के सामने तेल से लेकर खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों की बड़ी चुनौती

 

नई दिल्ली ,उत्तर प्रदेश में सातवें चरण के मतदान के साथ करीब दो महीने से चल रही पांच राज्यों की चुनावी प्रक्रिया अब  लगभग पूरी हो गई है. इससे चुनाव प्रचार में व्यस्त रही केंद्र की मोदी सरकार को अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए अब  पूरा समय मिलेगा. देखा जाए  इन दो महीनों में अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर काफी कुछ बदलाव आया है. क्योंकि तेल से लेकर खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें सरकार के सामने बड़ी चुनौती पेश कर रही हैं. आइए जानते हैं कि देश की  सरकार को किन-किन मोर्चों पर चुनौती मिलने वाली है.

1. बढ़ते कच्चे तेल के दाम 

इस साल आर्थिक सर्वे में कच्चे तेल की कीमतें 70 से 75 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान जताया गया था. लेकिन  अब यह अनुमान गलत साबित हुआ है. सात मार्च को ही  कच्चे तेल की कीमत 139 डॉलर के पार पहुंच गईं. हालांकि, देर रात को यह थोड़ी कम  123 डॉलर प्रति बैरल तक आ गईं.पर देश मे बीते चार नवंबर से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है.
विशेषज्ञों के अनुसार , इस समय क्रूड की मौजूदा कीमतों के अनुसार पेट्रोल-डीजल की कीमतें बहुत कम हैं. ऐसे में सरकार  अब पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी का फैसला ले सकती है. यदि ऐसा होता है तो महंगाई और मुद्रास्फीति प्रत्याशा दोनों में जबरदस्त उछाल देखने को मिलेगा .

2. कमोडिटी पर दबाव  कच्चे तेल के बढ़ते रेट का दवाब 

कच्चे तेल की कीमतों में हो रही लगातार बढ़ोतरी का असर अन्य प्रमुख कमोडिटी पर भी साफ नजर आ रहा है. इनकी कीमतों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा  रही है. सात मार्च को शाम पांच बजे के करीब ब्लूमबर्ग कमोडिटी इंडेक्स (बीसीओएम) 132.37 अंक पर था. यह सात जुलाई 2014 के बाद अपने उच्च स्तर पर  है. 24 फरवरी के बाद से इसमें एकदम  17 अंक की बढ़ोतरी हुई है. इसी दिन रूस ने यूक्रेन पर सैन्य कार्रवाई शुरू की थी. कमोडिटी  जानकारों के अनुसार कमोडिटी की कीमतों में आई इस तेजी पर आसानी से काबू नहीं पाया जा सकता है.

3. बढ़ती थोक महंगाई दर

बीते 10 महीनों से देश में थोक महंगाई दर दो अंकों में बढ़ रही हैं. हालांकि, बीते दो महीनों से इसमें थोड़ी नरमी रही है. पर रूस-यूक्रेन के बीच युद्ध से हाल में थोक दरों में जबरदस्त बढ़ोतरी  दर्ज हुई है. जब आरबीआई महंगाई की चुनौती से निपटने के लिए अपनी ब्याज दरों में बढ़ोतरी करेगा तो इसके परिणाम स्वरूप वास्तविक ब्याज दरों में बढ़ोतरी होगी. इसके कारण  असर यह होगा कि थोक महंगाई में वृद्धि होगी. और थोक महंगाई में वृद्धि सरकार के लिए अच्छी खबर नहीं होगी क्योंकि इससे निवेश प्रभावित हो सकता है. निवेश प्रभावित होता है तो पूंजी लागत भी बढ़ेगी.जो की अच्छी खबर नहीं है . 

4. सरकार पर टैक्स कटौती का दबाव

कच्चे तेल की मार से निपटने के लिए सरकार पर केंद्रीय करों में कटौती का दबाव रहेगा. इससे राजस्व में भी  कमी आएगी. एचएसबीसी इंडिया के मुख्य अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी ने हाल ही में अपने एक रिसर्च नोट में कहा था कि घरेलू तेल की कीमतों में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी से कॉरपोरेट के लाभ में 0.25 फीसदी की कमी आएगी. प्रांजुल ने कहा था कि इनपुट लागत में एक फीसदी की वृद्धि से लाभ में 0.4 प्रतिशत की गिरावट होती है. नोट में कहा गया था कि कॉरपोरेट लाभ में कमी से जीडीपी में भी  0.3 प्रतिशत की गिरावट हो सकती है.

5. खाद्य पदार्थों की कीमत

यूक्रेन और रूस के बीच जारी सैन्य संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य पदार्थों की कीमतें सातवे आसमान पर पहुंच गई हैं. संयुक्त राष्ट्र का खाद्य कीमत इंडेक्स सर्वकालिक अपने अब तक के उच्च स्तर 140.7 प्रतिशत पर पहुंच गया है. और भारत के कृषि उत्पादन का अधिकांश हिस्सा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चला जाता है. ऐसे में घरेलू स्तर पर खाद्य पदार्थों की कीमतों में एक  व्यापक स्तर पर बढ़ोतरी हो सकती है. अनाज की कीमतों में सतत वृद्धि खाद्य महंगाई के लिए बहुत बुरी खबर है. और दूसरी और कीमतों में लगातार वृद्धि से देश की  सरकार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाने का दबाव भी बढ़ सकता है.