राजस्थान में जीरा क्वालिटी बेहतर उत्पादन भी खूब, फिर भी गुजरात अव्वल, जानिए क्या है कारण

राजस्थान में जीरा बेहतर क्वालिटी का होता है और देश का 60% जीरा उत्पादन राजस्थान में हो रहा है. फिर भी गुजरात से राजस्थान पिछड़ा क्यों है आइये जानिए
 

Jeera Mandi : राजस्थान में इस बार जीरे की बंपर पैदावार होने का अनुमान है. पिछले साल जीरा के भाव किसानों को 60000 प्रति क्विंटल तक के भाव मिले थे. लेकिन इस साल सीजन आते आते जीरा मंडियो में अब न्यूनतम 17000 और अच्छी क्वालिटी का जीरा 25 से 30 हजार रुपए प्रति क्विंटल के बीच बिक रहा है. मंडियो में जैसे ही जीरे की आवक आनी शुरू हुई एकदम से भाव गिरते चले गए.

यही जीरा आज से 2 महीने पहले 40 से 45 हजार रुपए प्रति क्विंटल बिक रहा था. फसल की गुणवत्ता उत्पादन की दृष्टि से मसाले में शुमार जीरा सर्वाधिक पश्चिमी राजस्थान में होता है. देश में करीब 60% जीरा का उत्पादन राजस्थान करता है. वही गुजरात में 40% जीरे का उत्पादन होता है. गुजरात की उंझा मंडी देश का प्रमुख जीरा हब के रूप में उभरा है.

ज्यादा उत्पादन के बावजूद भी राजस्थान इस मामले में अभी पीछे है. इसका कारण है राजस्थान में प्रोसेसिंग इकाइयां ना होना. गुजरात में 300 से अधिक प्रोसेसिंग इकाइयां चल रही है जबकि राजस्थान में 100 ही नहीं है. प्रोसेसिंग इकाइयां ज्यादा होने के कारण राजस्थान के कई जिलों का जीरा ऊंझा मंडी जाता है. पश्चिमी राजस्थान में जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, जालौर, मेड़ता, बिलाड़ा इत्यादि स्थानों पर जीरे का बंपर उत्पादन होता है. प्रोसेसिंग इकाइयां ना होने के कारण राजस्थान को राजस्व का भी नुकसान हो रहा है. 

इसलिए है राजस्थान अव्वल 

पश्चिमी राजस्थान में उगने वाले जीरे के दाने का आकार बड़ा होता है जबकि गुजरात में उत्पादन होने वाले जीरे का आकार छोटा होता है. यहीं नहीं राजस्थान का जीरा धारीदार और अलग-अलग रंगों का होता है जबकि गुजरात का जीरा बिना धारी वाला और एक ही रंग का होता है. राजस्थान में उगने वाले जीरे की उम्र लंबी होती है. इसे 4 से 5 सालों तक सुरक्षित रखा जा सकता है. जबकि गुजरात का जीरा 1 साल के अंदर खराब हो जाता है.

पश्चिमी राजस्थान के जिलों में जीरे के लिए मिट्टी बेहद उपयुक्त है. जिसके कारण जीरे में मिनरल्स पाए जाते हैं जबकि गुजरात के जीरे में मिनरल्स नहीं होते,पश्चिमी राजस्थान के जीरे की क्वालिटी ऑयल, कंटेंट मानकों पर श्रेष्ठ है एसा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के वैज्ञानिकों ने बताया है. एक दूसरा कारण यह भी है कि जोधपुर में जीरे का रिसर्च सेंटर न होने के कारण जीरे की कोई नई किस्म में भी विकसित नहीं हो पा रही है.