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UP में किसानों के लिए मुनाफे का सौदा बनी बेबी कॉर्न की खेती, 3 महीने में पक जाती है फसल

UP News: वर्तमान समय में किसान अब केवल परंपरागत खेती तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि उनकी सोच अब आमदनी बढ़ाने की ओर केंद्रित हो गई है। पहले की तुलना में अब खेती करना आसान तो जरूर हुआ है, लेकिन लागत भी काफी बढ़ गई है। ऐसी मुनाफे वाली खेती को आम तौर पर व्यावसायिक खेती या कैश क्रॉप फार्मिंग कहा जाता है। यहां कुछ प्रमुख फसलें हैं जिनका रुझान आजकल किसानों में तेजी से बढ़ रहा है:

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UP में किसानों के लिए मुनाफे का सौदा बनी बेबी कॉर्न की खेती, 3 महीने में पक जाती है फसल

Uttar Pradesh News: आज के समय में खेती में बदलाव की जरूरत को किसान भी अच्छे से समझने लगे हैं।  आज के समय में किसानों का ध्यान अपनी आमदनी बढ़ाने की ओर ज्यादा लगा रहता है. पहले के जमाने के हिसाब से अब खेती करने में ज्यादा लागत आती है. आज के समय में खेती आसान होने के साथ-साथ महंगी भी होने लगी है। लेकिन अब किसानों का रुझान मुनाफे वाली खेती की ओर ज्यादा हो रहा है.

ज्यादा लागत लगने के बावजूद भी मुनाफे के चांस काफी कम

किसानों को परंपरागत खेती में ज्यादा लागत लगने के बावजूद भी मुनाफे के चांस काफी कम होते हैं. परंपरागत फसलों से यह फसल कम समय में तैयार होती है और ज्यादा मुनाफा देकर जाती है। संकर मक्का के अलावा किसान स्वीट कॉर्न और बेबी कॉर्न की खेती से ज्यादा मुनाफा हैं। वह इन फसलों की खेती से लाभ उठा रहे हैं क्योंकि वे कम समय में तैयार होते हैं और अधिक मुनाफा देते हैं।

नई और अधिक मुनाफे वाली फसलों की ओर रुझान

अब किसानों ने परंपरागत खेती में बढ़ती लागत और कम होते मुनाफे के कारण नई और अधिक मुनाफे वाली फसलों की ओर रुझान देखा है। इसलिए किसान अब देसी और संकर मक्का के अलावा बेबी कॉर्न और स्वीट कॉर्न भी उगा रहे हैं। यह फसलें न सिर्फ कम समय में तैयार हो जाती हैं, बल्कि उनका बाजार मूल्य अधिक होने से अधिक आय होती है। इसकी खेती अपागगढ़ क्षेत्र में लगभग 100 बीघा में की जाती है। सामान्य मक्का की प्रति क्विंटल कीमत लगभग 2000 रुपये है। बेबी कॉर्न और स्वीट कॉर्न वहीं होटल, रेस्तरां और अन्य स्थानों पर उपलब्ध हैं। 8 से 10 हजार रुपये प्रति क्विंटल इसका मूल्य होता है।

इसका उपयोग सलाद और अचार में होता है

स्वीट और बेबी कॉर्न को सलाद और अचार के साथ पिज्जा में भी मिलाया जाता है। स्वीट कॉर्न दाना मीठा होता है, इसलिए सूप बनाया जाता है। पौष्टिक होने के कारण यह स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा है। गांव पुन्हैरा के किसान रामसेवक ने बताया कि इस फसल को किसी भी मौसम में लगाया जा सकता है, जिससे नुकसान कम होता है। कुछ लोग ठेका लेकर खेती करते हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त लाभ मिलता है। पिपहरा के किसान पंचम सिंह ने बताया कि साधारण फसलों से अधिक लाभ नहीं मिलता। इस फसल से काफी बचत होती है।

जिला कृषि अधिकारी डॉ. मनवीर सिंह ने बताया कि यह फसल 70 से 90 दिनों में तैयार हो जाती है। महानगरों में इसकी अधिक मांग से भाव भी अच्छा मिलता है। फिलहाल, विभाग ने जिले में किसानों के लिए इस फसल के लिए कोई कार्यक्रम नहीं बनाया है। उम्मीद है कि जल्द ही कोई कार्यक्रम बनाकर किसानों को फायदा होगा। किसानों को लगता है कि यह फसल फायदेमंद होगी।