चने की इन 2 किस्मों से मिलेगी बंपर पैदावार, फसल में रोगों से मिलेगा छुटकारा
Gram farming : देश में अक्टूबर महीने में रबी सीजन की शुरुआत हो जाएगी। रबी सीजन में मुख्य तौर पर गेहूं, सरसों और चना की फसल बोई जाती है। चना दलहनी फसलों की मुख्य फसल है। देश में बड़े स्तर पर चने की खेती की जाती है। आज हम आपको चने ऐसी किस्मो के बारे में बताने जा रहें है जो रोग प्रतिरोधक क्षमता भरपूर हैं। जिनकी खेती कर आप बंपर उत्पादन ले सकते हैं।
Gram New Variety : भारत में आगामी रबी सीजन की शुरुआत हो जाएगी। इसमें मुख्य तौर पर किसान गेहूं चना और सरसों की खेती बड़े पैमाने पर करते हैं। चना दलहनी फसलों की मुख्य फसल है। इसकी खेती किसानों के लिए काफ़ी फायदेमंद मानी जाती है।आमतौर पर फसल बोने से पहले उसके बीज का चुनाव करना बेहद जरूरी होता है। इसलिए किसानो को चने की फसल बोने से पहले बीज का चुनाव कर सही तरीके से कर लेना चाहिए।
वैसे चने को बंगाल ग्राम या छोलिया के नाम से भी जाना जाता है। इसकी खेती कर किसान दो तरह से मुनाफा उठा सकते हैं। किसान चने को गुच्छी बनाकर बाजार में बेच सकते हैं। क्योंकि लोग हरे चने को बहुत ज्यादा पसंद करते हैं। इस तरह किसानो के लिए यह फसल कुबेर का खजाना है। फिलहाल मंडियो में चने की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो रही है। इसलिए इस बार किसान चने की खेती की ओर काफी आकर्षित हो रहे हैं।
चने की खेती करने के लिए इन बातों का रखें ध्यान
चने की फसल के लिए दोमट मिट्टी को बेहतर माना जाता है। वैसे आमतौर पर किसी भी तरह की मिट्टी में चने की फसल बोई जा सकती है। चने की फसल की दो बार सिंचाई करनी पड़ती है। पहली सिंचाई के बाद फसल की निराई-गुड़ाई सही ढंग से करनी बेहद जरूरी है। जिससे आपकी फसल में खरपतवार का नामोनिशान नहीं रहेगा। बाद में फूलों के समय इसमें किसी भी तरह की बीमारी आने पर पेस्टिसाइड का प्रयोग करना चाहिए। हालांकि हम आज आपको जिन 2 किस्मो के बारे में बताने जा रहे हैं उनमे रोग प्रतिरोधक क्षमता भरपूर पाई जाती है। यह किस्म आपको बंपर उत्पादन देकर मालामाल कर देगी।
चने की खेती के लिए ज़रूरी बातें
चने की बुवाई का सबसे अच्छा समय 25 अक्टूबर से 5 नवंबर तक का होता है.
चने की खेती के लिए दोमट या भारी दोमट, मार और पंडुआ मिट्टी अच्छी होती है.
चने की खेती के लिए ज़रूरी है कि मिट्टी में जल निकास की उचित व्यवस्था हो.
चने की बुवाई सीड ड्रिल से करनी चाहिए.
चने की बुवाई करते समय पौधों की संख्या 25 से 30 प्रति वर्ग मीटर रखनी चाहिए.
पंक्तियों के बीच की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखनी चाहिए.
चने की खेती में दीमक और कटवर्म से बचाव के लिए, आखिरी जुताई से पहले खेत में क्यूनालफ़ॉस (1.5 प्रतिशत) चूर्ण मिलाना चाहिए.
चने की खेती में जड़ गलन और उखेड़ा रोग से बचाव के लिए, बुवाई से पहले ट्राइकोडर्मा हरजेनियम और स्यूडोमोनास फ़्लोरेसेंस जैव उर्वरक का इस्तेमाल करना चाहिए.
चने की पहली सिंचाई बुवाई के 45-60 दिनों बाद करनी चाहिए.
चने की दूसरी सिंचाई फलियों में दाना बनते समय करनी चाहिए.
चना पंत ग्राम 10 (पीजी 265)
चना पंत ग्राम 10 (पीजी 265) चना की एक बेहतरीन की किस्म है। इस फसल को एक बार बोने के बाद जो बीज प्राप्त होता है, किसान उसकी भी बिजाई दो-तीन साल तक कर सकते हैं। इस किस्म को कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर उत्तराखंड के वैज्ञानिकों ने तैयार किया है। चना की इस किस्म को उत्तर प्रदेश बिहार झारखंड पश्चिम बंगाल और असम के किसान बिजाई कर सकते हैं। यह एक रोग प्रतिरोधी क्षमता से भरपूर किस्म है। किसान इसकी खेती कर बंपर उत्पादन ले सकते हैं। क्योंकि है रोग प्रतिरोधक क्षमता के साथ-साथ बंपर उत्पादन देने में भी सक्षम है।
इस वैरायटी की पकाने की अवधि 130 दिनों की होती है। यह एक लंबी अवधि वाली किस्म है। सही तरीके से निराई गुड़ाई कर ली जाए और बढ़िया ढंग से खाद संरक्षण कर दिया जाए तो यह 17.79 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन दे सकती है। इसमें इसमें विल्ट, कॉलर रॉट, बौनापन जैसे रोग ना के बराबर होते हैं। साथ ही फली छेदक कीट के प्रति भी यह सहनशील पाई गई है।
चना नांदयाल ग्राम 1267
चना इस किस्म को आईसीएआर-एआईसीआरपी ऑन पल्सेस मुख्य केंद्र आरएआरएस नंद्याल और आचार्य एन जी रंगा कृषि विश्वविद्यालय आंध्र प्रदेश के वैज्ञानिकों ने मिलकर तैयार किया है। इस किस्म को मुख्य तौर पर आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु के किसानों के लिए तैयार किया गया है। चना के इस किस्म की खेती वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त मानी जाती है। हालांकि एक दो सिंचाई करके भी किसान इससे उपज हासिल कर सकते हैं।
यह छोटी अवधि की किस्म है, इसे तैयार होने में 90-95 दिनों का समय लगता है। इस किस्म में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। इसलिए बाजार में इसके अच्छे दाम मिलेंगे। इस किस्म की खेती करके किसान प्रति हेक्टेयर औसतन 20.95 क्विंटल तक का उत्पादन हासिल कर सकते हैं। जबकि अधिकतम पैदावार 22 क्विटल तक किसान ले सकते हैं।

